बकरी पालन कैसे करें ?

बकरी पालन

बकरी पालनबकरी पालन प्रायः सभी जलवायु में कम लागत, साधारण आवास, सामान्य रख-रखाव तथा पालन-पोषण के साथ संभव है। इसके उत्पाद की बिक्री हेतु बाजार सर्वत्र उपलब्ध है। इन्हीं कारणों से पशुधन में बकरी का एक विशेष स्थान है। आज जब एक ओर पशुओं के चारे-दाने होने से पशुपालन आर्थिक दृष्टि से कम लाभकारी हो रहा है वहीं बकरी पालन कम लागत एवं सामान्य देख-रेख में गरीब किसानों एवं खेतिहर मजदूरों के जीविकोपार्जन का एक साधन बन रहा है। इतना ही नहीं इससे होने वाली आय समाज के आर्थिक रूप से सम्पन्न लोगों को भी अपनी ओर आकर्षित कर रहा है। बकरी पालन स्वरोजगार का एक प्रबल साधन बन रहा है।

बकरी पालन की उपयोगिता:

बकरी पालन मुख्य रूप से मांस, दूध एवं रोंआ (पसमीना एवं मोहेर) के लिए किया जा सकता है। बकरियाँ अल्प आयु में वयस्क होकर दो वर्ष में कम से कम 3 बार बच्चों को जन्म देती हैं और एक वियान में 2-3 बच्चों को जन्म देती हैं। बकरियों से मांस, दूध, खाल एवं रोंआ के अतिरिक्त इसके मल-मूत्र से जमीन की उर्वरा शक्ति बढ़ती है। बकरियाँ प्रायः चारागाह पर निर्भर रहती हैं। यह झाड़ियाँ, जंगली घास तथा पेड़ के पत्तों को खाकर हमलोगों के लिए पौष्टिक पदार्थ जैसे मांस एवं दूध उत्पादित करती हैं।

बकरियों की प्रमुख नस्लें :

संसार में बकरियों की कुल 102 प्रजातियाँ उपलब्ध है। जिसमें से 20 भारतवर्ष में है। अपने देश में पायी जाने वाली विभिन्न नस्लें मुख्य रूप से मांस उत्पादन हेतु उपयुक्त है। यहाँ की बकरियाँ पश्चिमी देशों में पायी जाने वाली बकरियों की तुलना में कम मांस एवं दूध उत्पादित करती है क्योंकि वैज्ञानिक विधि से इसके पैत्रिकी विकास, पोषण एवं बीमारियों से बचाव पर समुचित ध्यान नहीं दिया गया है। बकरियों का पैत्रिकी विकास प्राकृतिक चुनाव एवं पैत्रिकी पृथकता से ही संभव हो पाया है। पिछले 25-30 वर्षों में बकरी पालन के विभिन्न पहलुओं पर काफी लाभकारी अनुसंधान हुए हैं फिर भी राष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय स्तर पर गहन शोध की आवश्यकता है। भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली की ओर से भारत की विभिन्न जलवायु की उन्नत नस्लें जैसेः ब्लैक बंगला, बारबरी, जमनापारी, सिरोही, मारबारी, मालावारी, गंजम आदि के संरक्षण एवं विकास से संबंधित योजनाएँ चलायी जा रही है। इन कार्यक्रमों के विस्तार की आवश्यकता है ताकि विभिन्न जलवायु एवं परिवेश में पायी जाने वाली अन्य उपयोगी नस्लों की विशेषता एवं उत्पादकता का समुचित जानकारी हो सके। इन जानकारियों के आधार पर ही क्षेत्र विशेष के लिए बकरियों से होने वाली आय में वृद्धि हेतु योजनाएँ सुचारू रूप से चलायी जा सकती है।

इस लेख में बकरी पालन से संबंधित सारी जानकारी को प्रस्तुत किया गया है, जो बकरी पालकों और उन लोगों के लिए बहुत उपयोगी है जो इसमें अपना भविष्य बनाना चाहते है।

  • बकरियों की उपयोगी नस्लें – इस भाग में बकरियों की उपयोगी नस्लों, भारत की उपयोगी नस्लों एवं विदेश की प्रमुख नस्लों के विषय में जानकारी है।
  •  संकर नस्ल के बकरी पालन व उसकी उपयोगिता – इस भाग में प्रजनन हेतु नर के चयन, गर्भवती बकरी की देख-रेख, मांस उत्पादन हेतु बकरी पालन, बकरियों में होने वाले रोग एवं रोग के लक्षण तथा रोकथाम के विषय में जानकारी है।
  • बकरी पालन से संबंधित आवश्यक बातें – इस भाग में बकरी पालन से सम्बंधित आवश्यक बातो का वर्णन है।
  • दस व्यस्क बकरियों के आय-व्यय का ब्योरा – इस भाग में बकरियों के आय-व्यय का ब्योरा है।

बकरी पालन हेतु भारतीय मूल की  उपयोगी नस्लें :

ब्लैक बंगाल नस्ल की बकरी : इस जाति की बकरियाँ पश्चिम बंगाल, झारखंड, असोम, उत्तरी उड़ीसा एवं बंगाल में पायी जाती है। इसके शरीर पर काला, भूरा तथा सफेद रंग का छोटा रोंआ पाया जाता है। अधिकांश (करीब 80 प्रतिशत) बकरियों में काला रोंआ होता है। यह छोटे कद की होती है वयस्क नर का वजन करीब 18-20 किलो ग्राम होता है जबकि मादा का वजन 15-18 किलो ग्राम होता है। नर तथा मादा दोनों में 3-4 इंच का आगे की ओर सीधा निकला हुआ सींग पाया जाता है। इसका शरीर गठीला होने के साथ-साथ आगे से पीछे की ओर ज्यादा चौड़ा तथा बीच में अधिक मोटा होता है। इसका कान छोटा, खड़ा एवं आगे की ओर निकला रहता है।

इस नस्ल की प्रजनन क्षमता काफी अच्छी है। औसतन यह 2 वर्ष में 3 बार बच्चा देती है एवं एक वियान में 2-3 बच्चों को जन्म देती है। कुछ बकरियाँ एक वर्ष में दो बार बच्चे पैदा करती है तथा एक बार में 4-4 बच्चे देती है। इस नस्ल की मेमना 8-10 माह की उम्र में वयस्कता प्राप्त कर लेती है तथा औसतन 15-16 माह की उम्र में प्रथम बार बच्चे पैदा करती है। प्रजनन क्षमता काफी अच्छी होने के कारण इसकी आबादी में वृद्धि दर अन्य नस्लों की तुलना में अधिक है। इस जाति के नर बच्चा का मांस काफी स्वादिष्ट होता है तथा खाल भी उत्तम कोटि का होता है। इन्हीं कारणों से ब्लैक बंगाल नस्ल की बकरियाँ मांस उत्पादन हेतु बहुत उपयोगी है। परन्तु इस जाति की बकरियाँ अल्प मात्रा (15-20 किलो ग्राम/वियान) में दूध उत्पादित करती है जो इसके बच्चों के लिए अपर्याप्त है। इसके बच्चों का जन्म के समय औसत् वजन 1.0-1.2 किलो ग्राम ही होता है। शारीरिक वजन एवं दूध उत्पादन क्षमता कम होने के कारण इस नस्ल की बकरियों से बकरी पालकों को सीमित लाभ ही प्राप्त होता है।

यह गुजरात एवं राजस्थान के सीमावर्ती क्षेत्रों में भी उपलब्ध है। इस नस्ल की बकरियाँ दूध उत्पादन हेतु पाली जाती है लेकिन मांस उत्पादन के लिए भी यह उपयुक्त है। इसका शरीर गठीला एवं रंग सफेद, भूरा या सफेद एवं भूरा का मिश्रण लिये होता है। इसका नाक छोटा परन्तु उभरा रहता है। कान लम्बा होता है। पूंछ मुड़ा हुआ एवं पूंछ का बाल मोटा तथा खड़ा होता है। इसके शरीर का बाल मोटा एवं छोटा होता है। यह सलाना एक वियान में औसतन 1.5 बच्चे उत्पन्न करती है। इस नस्ल की बकरियों को बिना चराये भी पाला जा सकता है।

जमुनापारी नस्ल की बकरी : जमुनापारी भारत में पायी जाने वाली अन्य नस्लों की तुलना में सबसे उँची तथा लम्बी होती है। यह उत्तर प्रदेश के इटावा जिला एवं गंगा, यमुना तथा चम्बल नदियों से घिरे क्षेत्र में पायी जाती है। एंग्लोनुवियन बकरियों के विकास में जमुनापारी नस्ल का विशेष योगदान रहा है।

इसके नाक काफी उभरे रहते हैं। जिसे ‘रोमन’ नाक कहते हैं। सींग छोटा एवं चौड़ा होता है। कान 10-12 इंच लम्बा चौड़ा मुड़ा हुआ तथा लटकता रहता है। इसके जाँघ में पीछे की ओर काफी लम्बे घने बाल रहते हैं। इसके शरीर पर सफेद एवं लाल रंग के लम्बे बाल पाये जाते हैं। इसका शरीर बेलनाकार होता है। वयस्क नर का औसत वजन 70-90 किलो ग्राम तथा मादा का वजन 50-60 किलो ग्राम होता है।

इसके बच्चों का जन्म समय औसत वजन 2.5-3.0 किलो ग्राम होता है। इस नस्ल की बकरियाँ अपने गृह क्षेत्र में औसतन 1.5 से 2.0 किलो ग्राम दूध प्रतिदिन देती है। इस नस्ल की बकरियाँ दूध तथा मांस उत्पादन हेतु उपयुक्त है। बकरियाँ सलाना बच्चों को जन्म देती है तथा एक बार में करीब 90 प्रतिशत एक ही बच्चा उत्पन्न करती है। इस जाति की बकरियाँ मुख्य रूप से झाड़ियाँ एवं वृक्ष के पत्तों पर निर्भर रहती है। जमुनापारी नस्ल के बकरों का प्रयोग अपने देश के विभिन्न जलवायु में पायी जाने वाली अन्य छोटे तथा मध्यम आकार की बकरियाँ के नस्ल सुधार हेतु किया गया। वैज्ञानिक अनुसंधान से यह पता चला कि जमनापारी सभी जलवायु के लिए उपयुक्त नही हैं।

बीटल नस्ल की बकरी : बीटल नस्ल की बकरियाँ मुख्य रूप से पंजाब प्रांत के गुरदासपुर जिला के बटाला अनुमंडल में पाया जाता है। पंजाब से लगे पाकिस्तान के क्षेत्रों में भी इस नस्ल की बकरियाँ उपलब्ध है। इसका शरीर भूरे रंग पर सफेद-सफेद धब्बा या काले रंग पर सफेद-सफेद धब्बा लिये होता है। यह देखने में जमनापारी बकरियाँ जैसी लगती है परन्तु ऊँचाई एवं वजन की तुलना में जमुनापारी से छोटी होती है। इसका कान लम्बा, चौड़ा तथा लटकता हुआ होता है। नाक उभरा रहता है। कान की लम्बाई एवं नाक का उभरापन जमुनापारी की तुलना में कम होता है। सींग बाहर एवं पीछे की ओर घुमा रहता है। वयस्क नर का वजन 55-65 किलो ग्राम तथा मादा का वजन 45-55 किलो ग्राम होता है। इसके वच्चों का जन्म के समय वजन 2.5-3.0 किलो ग्राम होता है। इसका शरीर गठीला होता है। जाँघ के पिछले भाग में कम घना बाल रहता है। इस नस्ल की बकरियाँ औसतन 1.25-2.0 किलो ग्राम दूध प्रतिदिन देती है। इस नस्ल की बकरियाँ सलाना बच्चे पैदा करती है एवं एक बार में करीब 60% बकरियाँ एक ही बच्चा देती है।बीटल नस्ल के बकरों का प्रयोग अन्य छोटे तथा मध्यम आकार के बकरियों के नस्ल सुधार हेतु किया जाता है। बीटल प्रायः सभी जलवायु हेतु उपयुक्त पाया गया है।

बारबरी नस्ल की बकरी : बारबरी मुख्य रूप से मध्य एवं पश्चिमी अफ्रीका में पायी जाती है। इस नस्ल के नर तथा मादा को पादरियों के द्वारा भारत वर्ष में सर्वप्रथम लाया गया। अब यह उत्तर प्रदेश के आगरा, मथुरा एवं इससे लगे क्षेत्रों में काफी संख्या में उपलब्ध है।

यह छोटे कद की होती है परन्तु इसका शरीर काफी गठीला होता है। शरीर पर छोटे-छोटे बाल पाये जाते हैं। शरीर पर सफेद के साथ भूरा या काला धब्बा पाया जाता है। यह देखने में हिरण के जैसा लगती है। कान बहुत ही छोटा होता है। थन अच्छा विकसित होता है। वयस्क नर का औसत वजन 35-40 किलो ग्राम तथा मादा का वजन 25-30 किलो ग्राम होता है। यह घर में बांध कर गाय की तरह रखी जा सकती है। इसकी प्रजनन क्षमता भी काफी विकसित है। 2 वर्ष में तीन बार बच्चों को जन्म देती है तथा एक वियान में औसतन 1.5 बच्चों को जन्म देती है। इसका बच्चा करीब 8-10 माह की उम्र में वयस्क होता है। इस नस्ल की बकरियाँ मांस तथा दूध उत्पादन हेतु उपयुक्त है। बकरियाँ औसतन 1.0 किलो ग्राम दूध प्रतिदिन देती है।

सिरोही नस्ल की बकरी : सिरोही नस्ल की बकरियाँ मुख्य रूप से राजस्थान के सिरोही जिला में पायी जाती है। यह गुजरात एवं राजस्थान के सीमावर्ती क्षेत्रों में भी उपलब्ध है। इस नस्ल की बकरियाँ दूध उत्पादन हेतु पाली जाती है लेकिन मांस उत्पादन के लिए भी यह उपयुक्त है। इसका शरीर गठीला एवं रंग सफेद, भूरा या सफेद एवं भूरा का मिश्रण लिये होता है। इसका नाक छोटा परन्तु उभरा रहता है। कान लम्बा होता है। पूंछ मुड़ा हुआ एवं पूंछ का बाल मोटा तथा खड़ा होता है। इसके शरीर का बाल मोटा एवं छोटा होता है। यह सलाना एक वियान में औसतन 1.5 बच्चे उत्पन्न करती है। इस नस्ल की बकरियों को बिना चराये भी पाला जा सकता है।

बकरी पालन हेतु विदेशी मूल की बकरियों की प्रमुख नस्लें :

अल्पाइन नस्ल की बकरी : – यह स्विटजरलैंड की है। यह मुख्य रूप से दूध उत्पादन के लिए उपयुक्त है। इस नस्ल की बकरियाँ अपने गृह क्षेत्रों में औसतन 3-4 किलो ग्राम दूध प्रतिदिन देती है।

एंग्लोनुवियन नस्ल की बकरी : – यह प्रायः यूरोप के विभिन्न देशों में पायी जाती है। यह मांस तथा दूध दोनों के लिए उपयुक्त है। इसकी दूध उत्पादन क्षमता 2-3 किलो ग्राम प्रतिदिन है।

सानन नस्ल की बकरी : – यह स्विटजरलैंड की बकरी है। इसकी दूध उत्पादन क्षमता अन्य सभी नस्लों से अधिक है। यह औसतन 3-4 किलो ग्राम दूध प्रतिदिन अपने गृह क्षेत्रों में देती है।

टोगेनवर्ग नस्ल की बकरी :– टोगेनवर्ग भी स्विटजरलैंड की बकरी है। इसके नर तथा मादा में सींग नहीं होता है। यह औसतन 3 किलो ग्राम दूध प्रतिदिन देती है।

बकरी पालन से संबंधित आवश्यक बातें:

  • ब्लैक बंगाल बकरी का प्रजनन बीटल या सिरोही नस्ल के बकरों से करावें।
  • पाठी का प्रथम प्रजनन 8-10 माह की उम्र के बाद ही करावें।
  • बीटल या सिरोही नस्ल से उत्पन्न संकर पाठी या बकरी का प्रजनन संकर बकरा से करावें।
  • बकरा और बकरी के बीच नजदीकी संबंध नहीं होनी चाहिए।
  • बकरा और बकरी को अलग-अलग रखना चाहिए।
  • पाठी अथवा बकरियों को गर्म होने के 10-12 एवं 24-26 घंटों के बीच 2 बार पाल दिलावें।
  • बच्चा देने के 30 दिनों के बाद ही गर्म होने पर पाल दिलावें।
  • गाभीन बकरियों को गर्भावस्था के अन्तिम डेढ़ महीने में चराने के अतिरिक्त कम से कम 200 ग्राम दाना का मिश्रण अवश्य दें।
  • बकरियों के आवास में प्रति बकरी 10-12 वर्गफीट का जगह दें तथा एक घर में एक साथ 20 बकरियों से ज्यादा नहीं रखें।
  • बच्चा जन्म के समय बकरियों को साफ-सुथरा जगह पर पुआल आदि पर रखें।
  • बच्चा जन्म के समय अगर मदद की आवश्यकता हो तो साबुन से हाथ धोकर मदद करना चाहिए।
  • जन्म के उपरान्त नाभि को 3 इंच नीचे से नया ब्लेड से काट दें तथा डिटोल या टिन्चर आयोडिन या वोकांडिन लगा दें। यह दवा 2-3 दिनों तक लगावें।
  • बकरी खास कर बच्चों को ठंढ से बचावें।
  • बच्चों को माँ के साथ रखें तथा रात में माँ से अलग कर टोकरी से ढक कर रखें।
  • नर बच्चों का बंध्याकरण 2 माह की उम्र में करावें।
  • बकरी के आवास को साफ-सुथरा एवं हवादार रखें।
  • अगर संभव हो तो घर के अन्दर मचान पर बकरी तथा बकरी के बच्चों को रखें।
  • बकरी के बच्चों को समय-समय पर टेट्रासाइकलिन दवा पानी में मिलाकर पिलावें जिससे न्यूमोनिया का प्रकोप कम होगा।
  • बकरी के बच्चों को कोकसोडिओसीस के प्रकोप से बचाने की दवा डॉक्टर की सलाह से करें।
  • तीन माह से अधिक उम्र के प्रत्येक बच्चों एवं बकरियों को इन्टेरोटोक्सिमिया का टीका अवश्य लगवायें।
  • बकरी तथा इनके बच्चों को नियमित रूप से कृमि नाशक दवा दें।
  • बकरियों को नियमित रूप से खुजली से बचाव के लिए जहर स्नान करावे तथा आवास में छिड़काव करें।
  • बीमार बकरी का उपचार डॉक्टर की सलाह पर करें।
  • नर का वजन 15 किलो ग्राम होने पर मांस हेतु व्यवहार में लायें।
  • खस्सी और पाठी की बिक्री 9-10 माह की उम्र में करना लाभप्रद है।

किन्हीं दो जातियों के बकरा तथा बकरी के संयोग से उत्पन्न बकरी को संकर बकरी कहते हैं। झारखंड में राज्य के पशुपालन विभाग तथा अन्य संस्थाओं द्वारा बकरी के नस्ल सुधार हेतु किसानों के बीच काफी संख्या में जमुनापारी बकरों का वितरण किया गया जिसका वांछित लाभ नहीं हो पाया। इसका मुख्य कारण जमुनापारी नस्ल के विषय में समुचित ज्ञान का अभाव था।

बकरी के विभिन्न आर्थिक पहलुओं पर गहन अध्ययन से पता चला कि मांस तथा दूध उत्पादन में वृद्धि के लिए बीटल नस्ल उपयुक्त है। अतः ब्लैक बंगाल बकरी का प्रजनन बीटल बकरा से कराकर इस क्षेत्र के लिए उपयुक्त संकर नस्ल की बकरी का उत्पादन किया जा सकता है। यह संकर नस्ल की बकरी, बिहार की (झारखंड के अतिरिक्त) के लिए भी उपयुक्त है।

बीटल नस्ल के संयोग से उत्पादित संकर नस्ल के नर का वजन छः माह की उम्र में औसतन 12-15 किलो ग्राम हो जाता है। जबकि देशी (ब्लैक बंगाल) के नर का वजन केवल 7-8 किलो ग्राम रहता है। इस प्रकार बकरी पालन से होने वाली आय में डेढ़ से दोगुणी वृद्धि संभव है। संकर बकरियों के दूध उत्पादन में देशी की तुलना में करीब तिगुनी वृद्धि होती है।

बकरी प्रजनन – इस क्षेत्र में पायी जानेवाली ब्लैक बंगाल नस्ल के मादा बच्चे करीब 8-10 माह की उम्र में वयस्क हो जाते हैं। अगर शारीरिक वजन ठीक हो तो मादा मेमना (पाठी) को 8-10 माह की उम्र में पाल दिलाना चाहिए अन्यथा 12 महीने की उम्र में पाठी में ऋतुचक्र एवं ऋतुकाल छोटा होता है। वैसे बकरी में ऋतुचक्र करीब 18-20 दिनों का होता है एवं ऋतुकाल 36 घंटों का। बकरियाँ सालों भर गर्म होती है लेकिन अधिकांश बकरियाँ मध्य सितम्बर से मध्य अक्तूबर तथा मध्य मई से मध्य जून के बीच गर्म होती है। अन्य समय में कम बकरियाँ गर्म होती है। ऋतुकाल शुरू होने के 10-12 तथा 24-26 घंटों के बीच 2 बार पाल दिलाने से गर्भ ठहरने की संभावना 90 प्रतिशत से अधिक रहती है। इसे आप इस प्रकार समझ सकते है कि अगर बकरी या पाठी सुबह में गर्म हुई हो तब उसे उसी दीन शाम में एवं दूसरे दिन सुबह में पाल दिलाएं। अगर शाम को गर्म हुई हो  तो दूसरे दिन सुबह में पाल दिलावें।

बकरी पालकों को बकरी के ऋतुकाल (गर्म होने) के लक्षण के विषय में जानकारी रखना चाहिए। बकरी के गर्म होने के लक्षण निम्नलिखित हैं : –

  • विशेष प्रकार की आवाज निकालना।
  • लगातार पूंछ हिलाना।
  • चरने के समय इधर-उधर भागना।
  • नर के नजदीक जाकर पूंछ हिलाना तथा विशेष प्रकार का आवाज निकालना।
  • घबरायी हुई सी रहना।
  • दूध उत्पादन में कमी
  • भगोष्ठ में सूजन और योनि द्वार का लाल होना
  • योनि से साफ पतला लेसेदार द्रव्य निकलना तथा नर का मादा के उपर चढ़ना या मादा का नर के उपर चढ़ना।

उपरोक्त लक्षणों को पहचानकर बकरी पालक समझ सकते है कि उनकी बकरी गर्म हुई है अथवा नहीं। इन लक्षणों को जानने पर ही समय से गर्म बकरी को पाल दिलाया जा सकता है। बच्चा पैदा करने के 30-31 दिनों के बाद ही गर्म होने पर बकरी को पाल दिलावें।

सामान्यतया 30-40 बकरियों के लिए एक बकरा काफी है। एक बकरा से एक दिन में केवल एक ही बकरी को पाल दिलाना चाहिए एवं एक सप्ताह में अधिक से अधिक पांच बकरियों को। इस बीच बकरों को अधिक पौष्टिक भोजन देना जरूरी है नहीं तो बकरा कमजोर हो जायेगा।

ब्लैक बंगाल बकरी का प्रजनन बीटल या सिरोही बकरा तथा संकर पाठी या बकरी का प्रजनन संकर बकरा से ही कराएं। एक बात ध्यान देने योग्य है कि नर और मादा के बीच बाप-बेटी, बेटा-माँ एवं भाई-बहन का संबंध न हो। अगर दो गाँवों (‘अ’ और ‘ब’) में बीटल या विराही बकरा उपलब्ध कराया गया है तथा इससे संकर बकरी-बकरा का उत्पादन हुआ है तब 8-10 माह के बाद संकर पाठा-पाठी प्रजनन योग्य हो जायेगा। अगर इन दोनों गाँवों के बकरों तथा प्रजनन हेतु संकर पाठा का आपस में अदला-बदली नहीं किया जाय तब भाई-बहन, बाप-बेटी, बेटा-माँ के बीच प्रजनन होगा। अतः बकरा उपलब्ध कराने के 14-16 माह के बीच ‘अ’ गाँव के बकरा को ‘ब’ गाँव में तथा ‘ब’ गाँव के बकरा को ‘अ’ गाँव में अदला-बदला कर देना चाहिए। इसी प्रकार प्रजनन योग्य संकर पाठी का भी अदला-बदला करना चाहिए। संकर पाठी का प्रजनन संकर पाठा से ही कराना लाभप्रद है।

प्रजनन हेतु नर बकरी का चयन:

  • प्रजनन हेतु नर का चयन निम्नलिखित गुणों के आधार पर करें-
  • जुड़वा उत्पन्न नर का चुनाव करें।
  • नर के माँ का दूध उत्पादन पर ध्यान दें।
  • नर के शारीरिक वजन एवं बनावट पर ध्यान दें।
  • नर के अंडकोश की वृद्धि पर ध्यान देना चाहिए।

गर्भवती बकरी की देख-रेख:

गर्भवती बकरियों को गर्भावस्था के अंतिम डेढ़ महीने में अधिक सुपाच्य एवं पौष्टिक भोजन की आवश्यकता होती है और नियमित रूप से Growvit Power(ग्रोविट पॉवर ) देनी चहिये, क्योंकि इसके पेट में पल रहे भ्रूण का विकास काफी तेजी से होने लगता है। इस समय गर्भवती बकरी के पोषण एवं रख-रखाव पर ध्यान देने से स्वस्थ्य बच्चा पैदा होगा एवं बकरी अधिक मात्रा में दूध देगी जिससे इनके बच्चों में शारीरिक विकास अच्छा होगी।बकरियों में गर्भावस्था औसतन 142-148 दिनों का होता है। बच्चा देने के 2-3 दिन पहले से बकरी को साफा-सुथरा एवं अन्य बकरी से अलग रखें।

बकरी का आवास – वातावरण के अनुसार बकरियों के लिए आवास की व्यवस्था करनी चाहिए। यहाँ बकरियों को गर्मी, सर्दी, वर्षा तथा जंगली जानवरों से बचाने योग्य आवास की जरूरत है। आवास के लिए सस्ती से सस्ती सामग्री का व्यवहार करना चाहिए ताकि आवास लागत कम रहे। प्रत्येक वयस्क बकरी के परिवार के लिए 10-12 वर्गफीट जमीन की आवश्यकता होती है। प्रत्येक 10 बकरियों के परिवार के लिये 100-120 वर्ग फीट यानि 10’x12′ जमीन की आवश्यकता होगी। बकरा-बकरी को अलग-अलग रखना चाहिए। बकरी के लिए घर के किनारे-किनारे डेढ़ फीट ऊँचा तथा ढ़ाई से तीन फीट चौड़ा मचान बना देना चाहिए। मचान बनाने में यह ध्यान रखना चाहिए कि दो लकड़ी या बांस के टुकड़ों के बीच इतना कम जगह हो कि बकरी या बकरी के बच्चों का पांव उसमें न फंस सके।

अगर सम्भव हो तो घर की दीवाल से सटाकर बकरी गृह का निर्माण करें या किसी चहारदीवारी से। इस प्रकार लागत कम आयेगा। पीछे वाले दीवाल की ऊँचाई 8 फीट तथा आगे वाले का 6 फीट रखें। घर हवादार एवं साफ-सुथरा रहना चाहिए। जमीन मिट्टी एवं बालू से बना होना चाहिए। घर का सतह (जमीन) ढ़ालुआं होना चाहिए ताकि सफाई आसान हो। बकरियों खासकर बच्चों को ठंढ से बचाने का प्रबंध आवास में होना जरूरी है।

बकरियों का पोषण – बकरियाँ चरने के अतिरिक्त हरे पेड़ की पत्तियाँ, हरी घास, दाल चुन्नी, चोकर आदि पसन्द करती है। बकरियों को रोज 6-8 घंटा चराना जरूरी है। यदि बकरी को घर में बांध कर रखना पड़े तब इसे कम से कम दो बार भोजन दें। बकरी हरा चारा (लूसर्न, बरसीम, जई, मकई, नेपियर आदि) और पत्ता (बबूल, बेर, बकाइन, पीपल, बरगद, गुलर कटहल आदि) भी खाती है। एक वयस्क बकरी को औसतन एक किलो ग्राम घास या पत्ता तथा 100-250 ग्राम दाना का मिश्रण (मकई दरों, चोकर, खल्ली, नमक मिलाकर) दिया जा सकता है। उम्र तथा वजन के अनुसार भोजन की मात्रा को बढ़ाया या घटाया जा सकता है। गाय-भैंस की तरह भी कृट्टी/भूसा में दाना का मिश्रण पानी में मिलाकर बकरी को दे सकते है। आदत लग जाने पर बकरियाँ भी गाय-भैंस की तरह खाना खा सकती है। बकरा, दूध देने वाली बकरी एवं गर्भवती बकरी के पोषण पर ज्यादा ध्यान देने की जरूरत होती है। ग्रोवेल की बकरियों वजन बढाने की टॉनिक Amino Power (अमीनो पावर) और Growlive Forte (ग्रोलिव फोर्ट) प्रयोग करके तो देखें आप अच्चम्भित हो जायेंगें और आपका फायदा हो जायेगा दोगुना !

बकरियों के लिए उपयोगी चारा :
झाड़ियाँ : बेर, झरबेर
पेड़ की पत्तियाँ : नीम, कटहल, पीपल, बरगद, जामुन, आम, बकेन, गुल्लड, शीशम
चारा वृक्ष की पत्तियाँ : सू-बबूल, सेसबेनिया
सदाबहार घास : दूब, दीनानाथ, गिनी घास
हरा घास : लोबिया, बरसीम, लूसर्न आदि।

मांस उत्पादन हेतु बकरी पालन:

बाजार में मांस की मांग दिन-प्रतिदिन बढ़ रही है। जिसके कारण बकरियों की मूल्यों में भी काफी वृद्धि हुई है। ब्लैक बंगाल मांस उत्पादन हेतु उपयुक्त है। इसका प्रजनन बीटल या सिरोही नस्ल के बकरों से कराकर अधिक लाभ ले सकते है क्योंकि इससे उत्पन्न नर बच्चे छः माह की उम्र में औसतन 14-15 किलो ग्राम वजन प्राप्त कर लेता है। मांस उत्पादन वजन का 50 प्रतिशत मानकर चलें तब एक पाठा से 7-7.5 किलोग्राम मांस मिलेगा। जिसका बाजार भाव (400 रुपये/ किलो ग्राम) 2800 रुपये से 3200 रुपये तक आयेगा। इसके अतिरिक्त खाल, सिर, खूड़, आँत आदि से भी लाभ प्राप्त होता है।

अधिक वजन के लिए नर बच्चों का बंध्याकरण 2 माह की उम्र में कराना चाहिए तथा 15 किलोग्राम वजन प्राप्त कर लेने के बाद माँस हेतु उपयोग में लाना चाहिए। इस वजन को प्राप्त कर लेने पर, वजन की तुलना में माँस उत्पादन में वृद्धि होती है।

बकरियों में होने वाले रोग, रोग के लक्षण एवं रोकथाम:

अन्य पशुओं की तरह बकरियाँ भी बीमार पड़ती है। बीमार पड़ने पर उसकी मृत्यु भी हो सकती है। बकरियों में मृत्यु दर कम कर बकरी पालन से होने वाली आय में वृद्धि की जा सकती है। बीमारी की अवस्था में पशुचिकित्सक की राय लेनी चाहिए।

(क) बकरियों में परजीवी रोग – बकरी में परजीवी से उत्पन्न रोग अधिक होते है। परजीवी रोग से काफी क्षति पहुँचती है।बकरी को आंतरिक परजीवी से अधिक हानि पहुँचती है। इसमें गोल कृमि, फीता कृमि, फ्लूक, एमफिस्टोम और प्रोटोजोआ प्रमुख है। इसके प्रकोप के कारण उत्पादन में कमी, वजन कम होना, दस्त लगना, शरीर में खून की कमी होती है। शरीर का बाल तथा चमड़ा रूखा-रूखा दीखता है। इसके कारण पेट भी फूल सकता है तथा जबड़े के नीचे हल्की सूजन भी हो सकती है।

इसके आक्रमण से बचाव तथा उपचार के लिए नियमित रूप से बकरी के मल का जाँच कराकर कृमि नाशक दवा (नीलवर्म, पानाकिआर, वेन्डाजोल, वेनमीन्थ, डिस्टोडीन आदि) देनी चाहिए। कृमि नाशक दवा तीन से चार माह के अंतराल पर खासकर वर्षा ऋतु शुरू होने के पहले और बाद अवश्य दें।

आंतरिक परजीवी के अलावे वाह्य परजीवी से भी बकरी को बहुत हानि पहुँचती है। बकरी में विशेषकर छौनों में जूँ लग जाते है। गेमेक्सीन या मालाथिऑन या साईथिऑन का प्रयोग कर जूँ से बचाना जरूरी है। बकरी में खुजली की बीमारी भी वाह्य परजीवी के कारण ही होती है। बकरी को खुजली से बचाने के लिए प्रत्येक तीन महीने पर 0.25 प्रतिशत (1 लीटर पानी में 5 मिली लीटर दवा) मालाथिऑन या साईथिऑन का घोल से नहलाना चाहिए। नहलाने के पहले बकरी को खासकर गर्दन, नाक, पूँछ जाँघ के अन्दर का भाग तथा छाती के नीचने भाग को सेभलॉन का घोल या कपड़ा धोने वाला साबुन लगा देना चाहिए। इसके बाद मालाथिऑन या साईथिऑन के घोल से बकरी को नहलावें तथा पूरा शरीर को ब्रस से खूब रगड़े। बकरी को दवा का घोल पीने नहीं दें क्योंकि यह जहर है। नहलाने के एक घंटा बाद जहाँ-जहाँ खुजली है करंज का तेल लगा दें। खुजली वाले बकरी को एक दिन बीच कर 4-5 बार नहलाने से खुजली ठीक हो जायेगा। जिस दिन सभी बकरी को नहलाया जाय उसी दिन बकरी घर का छिड़काव भी उसी दवा के 2% घोल (1 लीटर पानी में 40 मिली लीटर दवा मिलाकर) से करें। इस तरह बकरी को खुजली से बचाया जा सकता है। दवा लगाने के बाद हाथ की सफाई अच्छी तरह करें क्योंकि यह जहर है।

(ख) बकरियों में सर्दी-जुकाम (न्यूमोनिया)– यह रोग कीटाणु, सर्दी लगने या प्रतिकूल वातावरण के कारण हो सकता है। इस रोग से पीड़ित बकरी को बुखार रहता है, सांस लेने में तकलीफ होती है एवं नाक से पानी या नेटा निकलता रहता है। कभी-कभी न्यूमोनिया के साथ दस्त भी होता है। सर्दी-जुकाम की बीमारी बच्चों में ज्यादा होती है एवं इससे अधिक बच्चे मरते हैं। इस रोग से ग्रसित बकरी या बच्चों को ठंढ़ से बचावें तथा Neoxyvita Forte (निओक्सीविटा फोर्ट) दवा एवं अमीनो पावर (Amino Power) दें। उचित समय पर उपचार करने से बीमारी ठीक हो जायेगी।

(ग) पतला दस्त (छेरा रोग) – यह खासकर पेट की कृमि या अधिक हरा चारा खाने से हो सकता है। यह कीटाणु (बैक्टीरिया या वायरस) के कारण भी होता है।इसमें पतला दस्त होता है। खून या ऑव मिला हुआ दस्त हो सकता है। सर्वप्रथम उचित दस्त निरोधक दवा Neoxyvita Forte (निओक्सीविटा फोर्ट) का प्रयोग कर दस्त को रोकना जरूरी है। दस्त वाले पशु को पानी में Electral Energy (एलेक्ट्रल एनर्जी) अवश्य पिलाते रहना चाहिए। कभी-कभी सूई द्वारा पानी चढ़ाने की भी आवश्यकता पड़ सकती है। पतला दस्त ठीक होने (यानि भेनाड़ी आ जाने पर) के बाद मल की जाँच कराकर उचित कृमि नाशक दवा दें। नियमित रूप से Growlive Forte (ग्रोलिव फोर्ट) देते रहने से पतला दस्त की बीमारी कम होगी पाचन शक्ति में सुधर होगा और वजन भी तेजी से बढ़ेगा । इस बीमारी का उचित उपचार पशुचिकित्सक की सलाह से करें।

(घ) सुरहा-चपका – यह संक्रामक रोग है। इस रोग में जीभ, ओंठ, तालु तथा खुर में फफोले पड़ जाते हैं। बकरी को तेज बुखार हो सकता है। मुँह से लार गिरता है तथा बकरी लँगड़ाने लगती है।ऐसी स्थिति में बीमार बकरी को अलग रखें। मुँह तथा खुर को लाल पोटास (पोटाशियम परमेगनेट) के घोल से साफ करें। खुरों के फफोले या घाव को फिनाइल से धोना चाहिए। मुँह पर सुहागा और गंधक के मिश्रण का लेप लगा सकते हैं।इस रोग से बचाव के लिए मई-जून माह में एफ॰एम॰डी॰ का टीका लगवा दें।

(ङ) आंत ज्वर (इन्टेरोटोक्सिमियां)- इस बीमारी में खाने की रुचि कम हो जाती है। पेट में दर्द होता है, दाँत पीसना भी संभव है, पतला दस्त तथा दस्त के साथ खून आ सकता है।दस्त होने पर Neoxyvita Forte (निओक्सीविटा फोर्ट ) दवा एवं Electral Energy (एलेक्ट्रल एनर्जी) देनी चहिये इस बीमारी से बचाव के लिए इन्टेरोटेक्सिमियां या एम.सी.सी. का टीका बरसात शुरू होने के पहले लगवा दें।

(च) पेट फूलना- इस बीमारी में भूख कम लगती है, पेट फूल जाता है, पेट को बजाने पर ढ़ोल के जैसा आवाज निकलता है।इस बीमारी में Growlive Forte (ग्रोलिव फोर्ट) सुबह और शाम १० से २० मिलीलीटर ७- से १० दिनों तक दें ,बिलकुल ठीक हो जायेगा और भूख भी खूब लगेगी ,वजन भी बढ़ेगा ।

(छ) जोन्स रोग – पतला दस्त का बार-बार होना, बदबूदार दस्त आना तथा वजन में क्रमशः गिरावट इस बीमारी का पहचान है।इससे ग्रसित बकरी को अलग रखें। अगर स्वास्थ्य में गिरावट नहीं हुई हो तो इस तरह के पशु का उपयोग मांस के लिए किया जा सकता है अन्यथा मरने के बाद इसे जमीन में गाड़ दें ताकि बीमारी फैले नहीं।

(ज) थनैल – बकरी के थन में सूजन, दूध में खराबी कभी-कभी बुखार आ जाना इस रोग के लक्षण हैं।दूध निकालने के बाद थन में पशु चिकित्सक की सलाह से दवा देनी चाहिए। थनैल वाले थन को छूने के बाद हाथ अच्छी तरह साबुन एवं डिटॉल से साफ कर लेना चाहिए।

(झ) कोकसिडिओसिस – यह बकरी के बच्चों में अधिक होता है लेकिन वयस्क बकरी में भी हो सकता है। इसके प्रकोप से पतला दस्त, कभी-कभी खूनी दस्त भी हो सकता है।कोकसिडिओसिस की बीमारी में Ciprocolen (सिप्रोकोलेन )देने से काफी फायदा होनी चहिये । रोग हो जाने पर दस्त का इलाज करें तथा मल की जांच के बाद उचित दवा दें।

(ञ) कन्टेजियस इकथाईमा – इस रोग से ग्रसित बकरी के बच्चों के ओठों पर तथा दोनों जबड़ों के बीच वाली जगह पर छाले पड़ जाते है जो कुछ दिनों के बाद सूख जाता है तथा पपड़ी पड़ जाता है यह संक्रामक रोग है।इस रोग से ग्रस्त पशु को अलग रखें तथा ओठों को लाल पोटास के घोल से धोकर बोरोग्लिसरिन लगावें।

ग्रामीण महिलाओं की आजीविका का सुरक्षित स्रोत- ब्रॉयलर बकरी पालन:

भारत में बकरियां, मुर्गियां या पशु पालन की प्रथा सदियों पुरानी है। बीते समय में, ग्रामीणों का मुख्य रोजगार पशु पालन होने के कारण वे इसी पर आश्रित रहते थे। लेकिन देश के विभिन्न भागों में, चारागाह भूमि और हरे चारे की कमी की वजह से पशु पालन, विशेष रुप से बकरी पालन, छोटे एवं घरेलू स्तर के पालकों के लिए कठिन हो गया है। देश के कई भागों में, बकरी पालन गैर-लाभदायक और महंगा होने के कारण अब एक अतीत बन कर रह गया है।सामयिक प्रयास और अनुसंधान के माध्यम से किसान अनुकूल प्रौद्योगिकियों के उपयोग द्वारा भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के भारतीय मसाला अनुसंधान संस्थान (आईआईआरएस) के कृषि विज्ञान केन्द्र के वैज्ञानिकों ने इस दिशा में सराहनीय पहल की है।

वैज्ञानिकों ने एक नई तकनीक ईजाद की है जिसके माध्यम से मेमनों के शरीर-भार में वृद्धि के लिए बढ़े शेड में पाला जाता है जिससे किसानों की आय में वृद्धि हो सके। डॉ. एम. आनंदराज, निदेशक आईआईएसआर, कोझीकोड के अनुसार इस विधि से भूमिहीन मजदूरों और छोटे किसानों को लाभ पहुँच रहा है। इतना ही नहीं, हरे चारे की कमी का मुकाबला करने के लिए वैज्ञानिक और कम लागत वाली प्रक्रिया भी विकसित कर ली गई है।

इस उद्देश्य के लिए कोई विशेष नस्ल निर्धारित नहीं की गई है। किसी भी स्थानीय नस्ल के मेमनों (दोनों नर व मादा) को इस पद्धति के माध्यम से चयन करके पाला जा सकता है।बकरी फ़ीड बाजार में उपलब्ध हो सकता है या किसान स्थानीय स्तर पर उपलब्ध सामग्री का उपयोग करके स्वयं फ़ीड मिश्रण तैयार कर सकते हैं।मेमनों के स्वस्थ विकास के लिए, पहली डी-वर्मिंग ब्रायलर पालन के 45वें दिन पर किया जाना चाहिए। डी-वर्मिंग हर महीने दोहराया जाना चाहिए।

विभिन्न महिला स्वयं सहायता समूह जैसे कावेरी, कुटम्बाश्री और निधि एवं केरल में कोझीकोड जिले में स्थित पेरुवान्नामुजी के अन्य किसान भी इस प्रक्रिया का पिछले पाँच सालों से प्रयोग कर रहे हैं। समूह के सदस्यों के अनुसार यह विधि उन किसानों के लिए उपयुक्त है जिनके पास पशुओं के चरने लिए पर्याप्त भूमि नहीं है। यह प्रौद्योगिकी किसानों को कम समय में अधिक संख्या में बकरी पालन करने में मदद करती है।

“अब यह तकनीक इस केन्द्र का एक प्रमुख कार्यक्रम बन गयी है। इस तकनीक की सफलता अकेले केरल तक ही सीमित नहीं है। कर्नाटक, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और गुजरात जैसे राज्यों से किसान इन स्वयं सहायता समूहों का दौरा उनकी सफलता का फार्मूला जानने के लिए कर रहे हैं। कृप्या आप इस वीडियो को भी देखें आधुनिक बकरी पालन कैसे करें ?

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FAQs

Growel Agrovet’s Veterinary Products include a complete range of animal health and nutritional supplements. These cover vitamins, minerals, amino acids, herbal tonics, calcium sources, immunity boosters, milk enhancers, disinfectants, and water sanitizers — all formulated for poultry, cattle, aqua, and other livestock.

Growel Agrovet products are suitable for poultry, dairy cattle, goats, pigs, horses, sheep, pets, and aquaculture species. Each product is tested for safety, bioavailability, and performance in different livestock systems.

Growel Agrovet offers an extensive range of veterinary subcategories:

  • Vitamin & Mineral Supplements– Maintain nutrition balance.
  • Amino Acid & Growth Promoters– Improve growth and feed efficiency.
  • Calcium Supplements– Support bones, eggshell, and milk production.
  • Herbal & Liver Tonics– Enhance metabolism and performance naturally.
  • Respiratory Healthcare Products– Manage CRD and respiratory infections.
  • Immunity Booster Supplements– Strengthen disease resistance.
  • Animal Milk Booster Supplements– Improve lactation and milk quality.
  • Feed Premixes– Used for preparing poultry, cattle, and aqua feed.
  • Water Sanitizers & Disinfectants– Maintain hygiene and biosecurity.
  • Electrolytes & Probiotics– Relieve heat stress and improve digestion.
  • Mycotoxin Binders– Protect feed and gut health.

Growel Agrovet’s products enhance growth, feed conversion ratio (FCR), reproduction, immunity, and yield. Regular use supports healthier, disease-resistant animals and better overall farm profitability.

Yes. All Growel Agrovet formulations are non-antibiotic, herbal, and residue-free. They ensure safe, natural performance without affecting meat, milk, or egg quality.

Most products are water-soluble or feed-mixable. Tonics and calcium supplements can be given directly or mixed with feed or water, while disinfectants and sanitizers are used by spraying or mixing as per label instructions.

Supplements should be used regularly for growth, immunity, stress management, and disease prevention. They are particularly beneficial during heat stress, vaccination, peak production, or recovery periods.

Calcium supplements help in developing strong bones, improving eggshell thickness, and increasing milk yield. They prevent calcium deficiency, leg weakness, and reproductive disorders.

Growel Agrovet’s respiratory healthcare range (like Respiratory Herbs and Viraclean) helps control Chronic Respiratory Disease (CRD), Infectious Bronchitis (IB), and other infections by improving lung function and reducing respiratory distress.

Milk booster supplements are specially formulated to enhance lactation, milk fat percentage, and SNF levels. They contain amino acids, vitamins, and herbal galactagogues that support continuous milk flow and udder health.

Immunity boosters strengthen the animal’s natural defense system, reduce mortality, and ensure faster recovery from diseases or heat stress. They help maintain consistent productivity and health in farms.

Feed premixes are balanced blends of essential nutrients used to prepare complete feed for poultry, aqua, and livestock. They guarantee uniform nutrient supply, reduce formulation errors, and enhance feed conversion efficiency.

Disinfectants and water sanitizers like Viraclean and Aquacure maintain biosecurity by controlling harmful bacteria and viruses in sheds, drinkers, and equipment. Regular use prevents disease outbreaks and ensures a healthier environment.

Yes, most products are compatible and can be used in combination for better results. For instance, pairing an immunity booster with a vitamin tonic or calcium supplement enhances overall animal performance.

You can purchase Growel Agrovet products from authorized distributors, Amazon , or directly via the official website: www.growelagrovet.com.

All formulations are developed using premium ingredients and rigorous quality checks. Each batch undergoes laboratory testing to ensure purity, safety, and performance.

No. Growel Agrovet formulations are safe, non-toxic, and residue-free. They do not interfere with regular medications or feed components when used as directed.

Yes. Many Growel Agrovet products are free from synthetic antibiotics, making them suitable for organic and sustainable livestock systems.

Visible improvements in feed intake, health, or productivity can usually be seen within 2–7 days of continuous use, depending on the animal’s health status and management conditions.

Growel Agrovet offers scientifically formulated, field-tested, and result-oriented animal healthcare products. Farmers trust the brand for its innovation, consistent quality, and performance-driven approach across India and abroad.

  • Identify the species: poultry vs cattle vs pigs etc.

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  • Identify the need: growth, immunity, organ health, water quality, hygiene.

  • Review the product label for species-specific dosage, usage instructions.

  • If unsure, consult our technical support or your veterinary advisor for guidance.

Yes. Our formulations are designed to be safe across various production systems — from large commercial poultry or cattle operations to smaller farms and even pet/companion-bird setups. Always follow the label instructions and consult your veterinarian if combining with other treatments.

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  • Water-soluble supplements: mix into drinking-water according to recommended dosage.
  • Feed-premixes: mix thoroughly into feed at specified incorporation rates.
  • Disinfectants/sanitizers: apply as per usage instructions (spray, dip, drinking-water dose).
  • Tonics/herbal syrups: dose using provided measuring device, often for a defined number of days.

In most cases, yes — many of our supplements are designed to be compatible with vaccines and standard medications. However, when using prescription medicines or during disease outbreaks, always consult your veterinarian before combining. Avoid overdosing or overlapping similar active ingredients.

Water sanitizers (acidifiers + sanitizing agents) help maintain clean drinking-water systems, reduce microbial load, and improve water intake and animal health. Disinfectants, especially broad-spectrum types, help eliminate bacteria, viruses, and fungi on surfaces, feeders, drinkers and housing—crucial for bio-security in commercial and large-scale operations.

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